अपनी उम्मीदों को उछाल

Apni ummidon ko uchhal, tu asamaan payega.

kaun yahan bina khoye paya hai.
gautam buddha, isha mashih, mahavir
sabne kai din yun bhatakte bitaya hai.
inki tarah tu naten to tod, sara jahan payega.
Apni ummidon ko uchhal, tu asamaan payega.

kamjoriyan bahot ho, par kamjor na pad tu.
duri ki na soch, na manjil ki aash rakh tu.
sapne sanjota ja, aur apni mehanat par vishvas rakh tu.
ek subah, tu sara jahan payega.
Apni ummidon ko uchhal, tu asamaan payega.

kya khoya kya paya ki na soch tu.
khoya to vo hai jisne pane ki koi ummid na ki.
tu tuta hai to kya hua.
apne aap ko tapa, pighlaa, fir bana.
ek bar fir, tu apne jeevan ka aashay payega.
Apni ummidon ko uchhal, tu asamaan payega.



अपनी उम्मीदों को उछाल

अपनी उम्मीदों को उछाल, तू आसमां पायेगा |

कौन यहाँ बिना खोए पाया है |
गौतम बुद्ध, ईशा मशीह, महावीर
सबने कई दिन यूँ भटकते बिताया है |
इनकी तरह तू नातें तो तोड़, सारा जहाँ पायेगा |
अपनी उम्मीदों को उछाल, तू आसमां पायेगा |

कमजोरियाँ बहोत हो, पर कमजोर न पड़ तू |
दुरी की न सोच, न मंजिल की आशा रख तू |
सपने संजोता जा, और अपनी मेहनत पर विश्वास रख तू |
एक सुबह, तू सारा जहाँ पायेगा |
अपनी उम्मीदों को उछाल, तू आसमां पायेगा |

क्या खोया क्या पाया की न सोच तू |
खोया तो वो है जिसने पाने की कोई उम्मीद न की |
तू टुटा है तो क्या हुआ |
अपने आप को तापा, पिघला, फिर बना |
एक बार फिर, तू अपने जीवन का आशय पायेगा |
अपनी उम्मीदों को उछाल, तू आसमां पायेगा |

अपनी उम्मीदों को उछाल,तू आसमां पायेगा |



Go hard Go deep.

Speak out loud, don’t beep in mind.

Put in a way that looks not kind.


Neither you up nor me down.

I found u in middle lets play around.

Either make me victim or victimize yourself.


Push and pull like fate swings.

Scratch and smack like it gona last forever.

Be so intense like there is no defense.


Don’t be ashamed, it is natural.

It is very much cultural.

More the nasty, better it is.

Go hard go deep go high.

Be Mine

Be my pain, which demand to be felt.

Be my happiness, which demands to be surged.

Be my dream, which make me lost.

Be my river, where I am running high.

Be my ocean, where I am waving.

Be my sky, where my desire is flying.

Be my fire, like your anger.

Be my sorrow, like our separation.

Be mine, like you will never be mine.

Complementary to God

“Are God and confidence complementary?” my nephew asked me. “Means”, I asked. My nephew replied, “we never seen God but we are so much confident about existence of God. So much so that we live in deep fear of God. Why do we not have confidence on ourself that we will not do any wrong rather living in fear of reaction by God? What is result into, fist we do wrong things then go to temple or the Ganga to pray or to take dip to wash our wrongdoings. And believe we have not done anything wrong. We do these things again and again, trapped in loop. Many people, who are successful in life and have confidence on their ability and conscience, declare themselves atheist.”

I replied, “I do not know I get your question rightly and replying you appropriately. I believe, God or worshiping of God creates hope. The hope that despite suffering, anxiety, stress, discontentment, unsatisfactoriness, which are reality of life, future will be good and brighter. If you generate positive emotions inside you with or without worshiping and believing in God, inspite of having negative emotion, it is best. Which is must reflect in your action. We are seeing distortion in all these ideas of worshiping God because of it become business for some and medium to gain power. Wrong things are not done by idea of God but by man itself. Then defend themselves under written religious texts, which are written by man itself! Saying these as word of God!”

Environment and materialism

We, human beings, often call ourself materialistic. We criticize ourself that we got in habit of materialistic pleasure. Irony is, though we have no respect for material and went for total destruction of material, but we call ourself materialistic. We are converting materials into poisonous gas and substance, and junk.

Concretisation Vs Beautification

Todays, we are covering every bare surface of earth by concrete for beautification. We make footpath, road separator, areas around home concrete. This leads to decrease in groundwater and fall of water table. We cover area around tree by concrete. Along with fall of water table, it leads to dying of trees. We are destroying our mother nature, which will finally lead to destruction of us. Our tendency and attitude toward permanence, so much so that we have created the pyramid of junk, concrete and plastic around us.

Creating unnecessary necessity

We are grown up in mohalla. Where, we can find every shop of day to day needs. Take tea, sweat, vegetables and other things, we can find that in 200-300 meter radius, without burning carbon or using vehicle. We had concept of weekly village mart. This is what, Gandhi called self reliance. But now, we are adopting western design of planning. We are planning cities and extension of cities such a way that, even if we plan to take tea, we have to use vehicle and burn carbon, creating unnecessary necessity. A carbon based economy.

लप्रेक : 01

ये राजीव चौक मेट्रो स्टेशन कितना कोम्प्लिकेटेड है।
मुझे लगता है इंसान इससे जयदा कोम्प्लिकेटेड है।
तुम आते ही सुरु होगये। तुम्हे आये हुए ज्यादा टाइम तो नहीं हुआ ना।
नहीं, यहाँ वैसे भी कौन बोर होता है।
तुम काफ़ी बदल गए हो। जीम करना छोड़ दिए क्या?
मैं तुम्हारे बारे में नहीं बोल सकता क्यूंकि मैं तुम्हे कभी जाना नहीं।
तुम अभी तक गुस्सा हो, ये बोल कर वो इधर उधर देखने लगती है।
इतनी भीड़ में इसकदर ख़ामोशी छायेगी सोचा नहीं था।
घर पर सब कैसे है? लास्ट टाइम कब घर गए थे?
सब बढियां है, घर डेढ़ साल पहले, जून २०१३.
क्या कर रहे हो। ये सब करने का क्या फायदा।
अगर फायदे के लिए सब कुछ करता तो काम सा काम ये हाल तो नहीं होता।
अच्छा, ये गुस्सा मेरी वजह से है या पुरानी वाली के वजह से।
फिर ख़ामोशी, और मुस्कराते रहने की कोशीश।
पोएम लिखते हो या छोड़ दिए|

अभी तुरंत एक लाइन आई है, सुनो

एक बार फिर अपना समझ कर देखेंगे।
एक बार फिर चोट खा कर देखेंगे ।

तुम नहीं मानोगे, मैं चलती हूँ, bye.

ये सुना चुके हो शायद……….थैंक गॉड, तुमने मेरे हस्बैंड के बारे में नहीं पूछा। जिससे मिलो वो यही पूछता है।
मैं जानबुझकर नहीं पूछा, तुम्हे कहाँ किसीकी फ़िक्र रहती है।
Ok Bye
अरे रुको एक और लाइन्स सुनाता हूँ।

अगर तमन्ना है, तो तम्मना तेरी।
अगर आरजू है, तो आरजू तेरी ।
अगर इश्क है, तो वो मुस्करात तेरी।
अगर वफ़ा है, तो बेवफाई तेरी।

सीसीडी चलो कॉफी पीते है। या कॉफी पीना भी छोड़ दिए।

क्लास भर का प्यार

कई लोगों के प्यार की उम्र शहर बदलने तक ही रहती है। शहर बदलते ही प्यार भी बदल जाता है। बचपन में हमारे प्यार का उम्र भी स्कूल बदलने तक रहता । कभी कभी तो क्लास बदलने तक। क्लास में आखरी बेंच पर बैठने का महत्त्व ही कुछ और है। मैं आखरी बेंच पर बैठता क्योंकि वो भी आखरी बेंच पर बैठती थी। अगर टीचर ने आगे बैठा दिया तो, काफी मशक्कत करनी पड़ती। कभी पेंसिल, कभी रबर गिराने के बहाने देखना पड़ता।

उपरवाला किसीकी इतनी जल्दी सुनता है हमे तब पता चला, जब उसे क्लास का मॉनिटर बना दिया गया। टीचर की अनुपस्थिति में वो बेंच की क्यारियों के बीच घुमा करती। अब देखने के लिए कष्ट न करना पड़ता। किसी को साइड हटकर बैठने को न कहना पड़ता। अब तो जान बूझकर बातें करते। ताकि वो पास आकर बातें करे, मना करे। तब अहंकार और शर्म तो गायब ही हो गयी थी।

उससे बातें करने का मौका तो, उसके रिक्से के पिछे  भागने पर भी न मिल पाई थी। और न ही उसके गली के चक्कर लगाने पर। आपकी हैरानी का मैं जबाब दे दूँ, कि मैं शिशु विद्या मंदिर में पढ़ा हूँ जहाँ लड़कियों को बहन और लड़कों को भैया कर बुलाया जाता। जहाँ लड़कों को लड़कियों से बात करने की अनुमति नहीं थी। बात करने पर पनिशमेंट मिला करती थी। हम रक्षाबंधन के दिन स्कूल नहीं जाया करते थे।

पर अब लगता था की उसे इस बात का अहशास हो जायेगा। पर वह अहसाश, अहसाश ही रह गया, जब अगले दिन क्लास टीचर ने मुझे क्लास में खड़े करके जमकर फटकार लगाई। कुछ डण्डे भी पड़े। उस वक्त, इस बात का रोना नहीं आया की डांट पड़ी, डण्डे पड़े। इस बात की कि वो मेरा शिकायत कैशे कर सकती है। फिर दोस्तों के तने। तबतो वो सिलसिला जारी रहा कई दिनों तक। कुछ दिनों बाद क्लास टीचर ने धमकी दे डाली कि अगले संडे मैं तुम्हारे घर आ रहा हुँ.। बस वो प्यार, क्लास भर का प्यार बनकर रह गया।