मध्य वर्ग

वर्ल्ड बैंक के अनुसार भारत में 41% जनाशंखियाँ गरीबी रेखा से निचे जीती है| मतलब ये लोग 21 रुपए भी एक दिन में नहीं कम पते हैं| ये है भारत का असली सच | लगभग 50% लोग मध्य वर्ग से तालुक रखते है| जो की अपने आप को इज्जतदार और स्वाभिमानी कहते है| मुझे लगता है सबसे बदतर जिंदगी एक मध्य वर्ग परिवार वालों की ही होती है| जिसके लिए समाज सबसे बढ़कर होता है| उनके जान इमां से बढ़कर होता है| पर इन लोगों को ये नहीं पता होता है की वे इन रुढ़िवादी समाज के गुलाम होते है| जिसमे समाज इसका मालिक होता है और इसका हरेक सदस्य इसका गुलाम| ये लोग सोचते है की इनमे काफी भाईचारा है, जिसमे लोग एक दुसरे को सामाजिक प्राणी कहते है| पर सच तो ये है की ये लोग दिखावे की जिंदगी जीते है|और हम भी इसमें जीने लगते और फिर इश्के अनुशार ढल जाते है| फिर इसे हम हाई सोसाइटी कहने लगते है| शायद आप सहमत न हो पर ये सच है| अब मैं इशे वर्गीकृत करना चाहूँगा|

आर्थिक दृस्तिकोंन से: आप आर्थिक समृधि की होड़ को ले सकते है| जोकि आपको अस्पस्ट दिखेंगे| अगर आपका परोशी स्पेंडर खरीदता है तो आप हुधिबबा खरीदते है चाहे आपको स्प्लांदर ही क्यूँ न पसंद हो| इस समृधि को पाने के लिए लोग किसी भी हद तक चले जाते है|इसके लिए लोग घुस लेने से लेकर लोगों को लुटने तक कर देते है|

सामाजिक दृस्तिकोंन से: ये लोग जानते है स्त्री और परुष में कोई अंतर नहीं, और खुशहाल जीवन के लिए स्त्री का विकाश हो और ये लोग डींगे भी खूब हांकेंगे पर जब अपने घर की स्त्री की बात आये तो सरे विचार हवा में उड़ जाते है|क्या आप घूँघट का रिवाज महाभारत या रामायण में सुना या देखा है? नहीं न ये घूँघट और पर्दा पर्थ ये मध्यवर्गी समाज की ही देन है|जो की अपने आप को इज्ज़तदार जताने के लिए कोई भी हद तक चले गए|ये अन्य धर्म से आया है सायद बुरका से| हम दिखावे में जीना जो सिख गए थे| ये दिखावा नहीं है तो क्या है|और भी कई तथ्य है जैसे जातिवाद रंगभेद,जिसके लिए माता-पिता जिसे ममता की मूरत कहते है अपने बच्चे के अरमानो का गला घोट देते है| जो अपने सवाभिमान रूपी तलवार से अपने पूज्य समाज के लिए हरेक अरमानो का कतल कर देते है| जो इसे काफी पुख्ता करते है जिसपे अभी बात न करना चाहूँगा|

समाज की इस हालत में हम सब सामिल है|पर इससे लरने की हममे हिम्मत नहीं| इसलिए जब मैं अपने गाँव जाता हूँ तो मुझे जायदा ख़ुशी महशुस होती है अपेछाकृत अपने सहर भागलपुर जाना| गाँव में मनोरंजन का कोई साधन भी नहीं पर समय ऐसे कट जाता है पता ही नहीं चलता| हाँ पर ये कह सकता हूँ अब इस कीचड़ में कमल खिलने सुरु हो गए, इसकी तादात बढती जा रही है, हवाएं मतवाली होती जा रही है, नज़रें रोशन होते जा रहे है|इस भारत का भविष्य काफी उज्वल है| बदलाव की सुरुवात हो चुकी है भले इसकी रफ़्तार धीरे है | भारत के ये नव पीडी भारत को सुनहरे कल की ओर ले जायेंगे|अंत में ये कहूँगा जो हरेक भारतीय कहना चाहेगा|

मुझे गर्व है की मैं भारतीय हूँ|

4 thoughts on “मध्य वर्ग

  1. Aapne is vishay me kafi achche se adhdhyan kiya hai tabhi in jeevant vicharon ko is chhote se panne me khoobsoorati se pesh kiya hai. Bahut achcha (Good one!) Hope evryone reads this.

    1. thanx sonal….wordpress me pata hi nahi kaise hindi likhte hai…ya isme option hai bhi nahi…isko orkut ke scrap me likh ke paste kiye hai…jisme ki khuch hindi me convert bhi nahi hua hai….

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