क्लास भर का प्यार

कई लोगों के प्यार की उम्र शहर बदलने तक ही रहती है। शहर बदलते ही प्यार भी बदल जाता है। बचपन में हमारे प्यार का उम्र भी स्कूल बदलने तक रहता । कभी कभी तो क्लास बदलने तक। क्लास में आखरी बेंच पर बैठने का महत्त्व ही कुछ और है। मैं आखरी बेंच पर बैठता क्योंकि वो भी आखरी बेंच पर बैठती थी। अगर टीचर ने आगे बैठा दिया तो, काफी मशक्कत करनी पड़ती। कभी पेंसिल, कभी रबर गिराने के बहाने देखना पड़ता।

उपरवाला किसीकी इतनी जल्दी सुनता है हमे तब पता चला, जब उसे क्लास का मॉनिटर बना दिया गया। टीचर की अनुपस्थिति में वो बेंच की क्यारियों के बीच घुमा करती। अब देखने के लिए कष्ट न करना पड़ता। किसी को साइड हटकर बैठने को न कहना पड़ता। अब तो जान बूझकर बातें करते। ताकि वो पास आकर बातें करे, मना करे। तब अहंकार और शर्म तो गायब ही हो गयी थी।

उससे बातें करने का मौका तो, उसके रिक्से के पिछे  भागने पर भी न मिल पाई थी। और न ही उसके गली के चक्कर लगाने पर। आपकी हैरानी का मैं जबाब दे दूँ, कि मैं शिशु विद्या मंदिर में पढ़ा हूँ जहाँ लड़कियों को बहन और लड़कों को भैया कर बुलाया जाता। जहाँ लड़कों को लड़कियों से बात करने की अनुमति नहीं थी। बात करने पर पनिशमेंट मिला करती थी। हम रक्षाबंधन के दिन स्कूल नहीं जाया करते थे।

पर अब लगता था की उसे इस बात का अहशास हो जायेगा। पर वह अहसाश, अहसाश ही रह गया, जब अगले दिन क्लास टीचर ने मुझे क्लास में खड़े करके जमकर फटकार लगाई। कुछ डण्डे भी पड़े। उस वक्त, इस बात का रोना नहीं आया की डांट पड़ी, डण्डे पड़े। इस बात की कि वो मेरा शिकायत कैशे कर सकती है। फिर दोस्तों के तने। तबतो वो सिलसिला जारी रहा कई दिनों तक। कुछ दिनों बाद क्लास टीचर ने धमकी दे डाली कि अगले संडे मैं तुम्हारे घर आ रहा हुँ.। बस वो प्यार, क्लास भर का प्यार बनकर रह गया।

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